वायरल ‘फायर चैलेंज’ क्या है? 9 साल की बच्ची 70 % जली, कैसे सोशल मीडिया ट्रेंड में फंस रहे युवा

वायरल ‘फायर चैलेंज’ क्या है? 9 साल की बच्ची 70 % जली, कैसे सोशल मीडिया ट्रेंड में फंस रहे युवा


आज के दौर में सोशल मीडिया सिर्फ मनोरंजन या जानकारी का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसा मंच बन चुका है जहां ‘लाइक्स’, ‘व्यूज’ और ‘फॉलोअर्स’ की अंधी दौड़ ने युवाओं और बच्चों की जान को भी जोखिम में डाल दिया है. सोशल मीडिया पर आए दिन कोई न कोई नया ट्रेंड या ‘चैलेंज’ वायरल होता रहता है. इनमें से कुछ चैलेंज मजेदार और हानिरहित होते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो सीधे तौर पर मौत का बुलावा होते हैं. ऐसा ही एक बेहद खतरनाक और खौफनाक ट्रेंड है ‘फायर चैलेंज’

हाल ही में इस जानलेवा चैलेंज की चपेट में आकर एक 9 साल की मासूम बच्ची के गंभीर रूप से झुलसने की दर्दनाक घटना ने एक बार फिर पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है. यह घटना इस बात का जीता-जागता सबूत है कि आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया का अनियंत्रित इस्तेमाल किस तरह हमारे घरों और बच्चों के लिए यमराज साबित हो रहा है. आइए विस्तार से जानते हैं कि यह ‘फायर चैलेंज’ क्या है, यह कैसे काम करता है और इसके पीछे की सामाजिक व मनोवैज्ञानिक वजहें क्या हैं.

क्या है वायरल ‘फायर चैलेंज’?

‘फायर चैलेंज’ सोशल मीडिया (विशेषकर टिकटॉक, इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स जैसी शॉर्ट-वीडियो ऐप्स) पर वायरल होने वाला एक ऐसा खतरनाक स्टंट है, जिसमें लोग अपनी जान जोखिम में डालते हैं. इस चैलेंज के नियमों के तहत व्यक्ति अपने शरीर पर कोई ज्वलनशील पदार्थ (जैसे नेल पॉलिश रिमूवर, रबिंग अल्कोहल, पेट्रोल या सैनिटाइज़र) छिड़कता है. इसके बाद, कैमरे के सामने उसमें आग लगा ली जाती है. व्यक्ति को यह दिखाना होता है कि वह आग की लपटों के बीच कितनी देर तक टिक सकता है या फिर पानी में कूदकर या कपड़ा झटककर कितनी जल्दी आग बुझा सकता है.

इस पूरी प्रक्रिया का वीडियो बनाया जाता है और उसे सोशल मीडिया पर ‘वायरल’ होने की उम्मीद में अपलोड किया जाता है.

देखने में यह भले ही किसी मूर्खतापूर्ण और असंभव हरकत जैसा लगे, लेकिन इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया में लाइमलाइट पाने की दीवानगी में कम उम्र के बच्चे और किशोर बिना सोचे-समझे इसकी नकल करने लगते हैं. वे यह भूल जाते हैं कि डिजिटल स्क्रीन पर जो करतब जादुई या रोमांचक लगते हैं, असल जिंदगी में वे शरीर को पलभर में राख बना सकते हैं.

9 साल की बच्ची के झुलसने की दर्दनाक घटना

हाल ही में सामने आई इस वीभत्स घटना ने समाज के हर वर्ग को सोचने पर मजबूर कर दिया है. मात्र 9 साल की एक मासूम बच्ची ने सोशल मीडिया पर इस ‘फायर चैलेंज’ के वीडियो देखे. कम उम्र और नासमझ होने के कारण वह यह भांप नहीं पाई कि आग से खेलना कितना भयानक हो सकता है. उसने इंटरनेट पर देखे गए इस स्टंट को घर पर अकेले या साथियों के साथ दोहराने की कोशिश की.

उसने अपने शरीर पर ज्वलनशील तरल पदार्थ छिड़ककर आग लगाई. आग इतनी तेजी से फैली कि पलभर में वह उसकी चपेट में आ गई. चीख-पुकार सुनकर जब तक परिवार के लोग पहुंचे, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. बच्ची बुरी तरह झुलस चुकी थी. उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी हालत बेहद नाजुक बनी हुई है. इस घटना ने एक बार फिर माता-पिता को डरा दिया है कि उनके बच्चे इंटरनेट की चारदीवारी के पीछे क्या देख रहे हैं और किस हद तक प्रभावित हो रहे हैं.

बच्चों और युवाओं पर क्यों हावी हो रहे हैं ऐसे खतरनाक ट्रेंड्स?

सवाल यह उठता है कि आखिर बच्चे या किशोर इस तरह के आत्मघाती कदम क्यों उठाते हैं? इसके पीछे कई मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण जिम्मेदार हैं.

अपरिपक्व दिमाग और समझ की कमी: 9 से 15 साल की उम्र वह होती है जब बच्चों का मस्तिष्क पूरी तरह विकसित नहीं होता. वे सही और गलत, या तात्कालिक रोमांच और दूरगामी परिणामों के बीच का अंतर नहीं समझ पाते. उन्हें लगता है कि वीडियो में सब बच जाते हैं, तो वे भी बच जाएंगे.

वर्चुअल दुनिया की लोकप्रियता की चाह: आज के समय में बच्चों के बीच ‘वायरल होना’ या ‘फेमस होना’ सबसे बड़ी उपलब्धि बनता जा रहा है. सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक्स, कमेंट्स और व्यूज बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालते हैं. उन्हें लगता है कि जितना खतरनाक स्टंट होगा, उतने ही ज्यादा लोग उन्हें जानेंगे.

पीयर प्रेशर: कई बार बच्चे अपने दोस्तों या सहपाठियों के सामने खुद को ‘बहादुर’ या ‘कूल’ साबित करने के लिए ऐसे जोखिम भरे चैलेंज स्वीकार कर लेते हैं.

अभिभावकों की डिजिटल दूरी: आजकल कामकाजी व्यस्तता के कारण माता-पिता बच्चों को मोबाइल तो थमा देते हैं, लेकिन वे यह मॉनिटर नहीं कर पाते कि बच्चा इंटरनेट पर किस तरह का कंटेंट देख रहा है. पैरेंटल कंट्रोल  की कमी बच्चों को सीधे इन खतरनाक एल्गोरिदम के संपर्क में ले आती है.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और कानून की विफलता

हालांकि टिकटॉक, मेटा (इंस्टाग्राम/फेसबुक) और अल्फाबेट (यूट्यूब) जैसी बड़ी तकनीकी कंपनियों ने ऐसे खतरनाक ट्रेंड्स को बैन करने और सर्च रिजल्ट्स पर चेतावनी जारी करने के दावे किए हैं, लेकिन हकीकत यह है कि एल्गोरिदम की प्रकृति ऐसी है कि सनसनीखेज और खतरनाक वीडियो तेजी से प्रमोट होते हैं.

जब तक कोई वीडियो रिपोर्ट होता है या मॉडरेट किया जाता है, तब तक लाखों बच्चे उसे देख चुके होते हैं. इसके अलावा, कई बार बच्चे वीपीएन (VPN) या अन्य तरीकों से इन पाबंदियों को पार कर लेते हैं. कानूनी स्तर पर भी ऐसे मामलों में जिम्मेदारी तय करना और सख्त नियम बनाना बेहद जरूरी हो गया है.

बचाव और समाधान

अगर हम अपने बच्चों को और समाज को इस तरह की डिजिटल त्रासदियों से बचाना चाहते हैं, तो समाज, सरकार और विशेषकर अभिभावकों को कड़े कदम उठाने होंगे.

खुली बातचीत: माता-पिता को अपने बच्चों के साथ दोस्ताना रिश्ता रखना चाहिए. उन्हें समझाना चाहिए कि सोशल मीडिया पर दिखने वाली हर चमकती चीज सच नहीं होती और स्टंट्स के पीछे वीएफएक्स, एडिटिंग या प्रोफेशनल सुरक्षा होती है.

डिजिटल पेरेंटिंग: बच्चों को मोबाइल देने से पहले उसमें ‘सेफ सर्च’ और पैरेंटल कंट्रोल ऐप एक्टिव करें. यह नजर रखें कि वे कौन से प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और किन क्रिएटर्स को फॉलो कर रहे हैं.

स्कूलों में डिजिटल साक्षरता: स्कूलों के पाठ्यक्रम में साइबर सेफ्टी और सोशल मीडिया के खतरों से जुड़ा एक अध्याय होना चाहिए, ताकि बच्चों को शुरुआत से ही यह सिखाया जा सके कि इंटरनेट का इस्तेमाल कैसे सुरक्षित तरीके से किया जाए.

9 साल की बच्ची का झुलसना केवल एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि हमारी आधुनिक व्यवस्था और डिजिटल अंधाधुंध दौड़ पर एक करारा तमाचा है. लाइक्स और व्यूज के भूखे इस वर्चुअल समाज में हमें यह तय करना होगा कि क्या एक वीडियो की लोकप्रियता किसी मासूम की जान से ज्यादा कीमती है? 



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