आखिर लड़कियां छिपकली से इतना डरती क्यों हैं? खुल गया राज

आखिर लड़कियां छिपकली से इतना डरती क्यों हैं? खुल गया राज


Why Are People Scared Of Lizards: घर की दीवार पर अचानक छिपकली दौड़ती हुई दिख जाए तो कुछ लोग उसे देखकर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन कई लोगों की हालत ऐसी हो जाती है कि दिल तेजी से धड़कने लगता है, पसीना आने लगता है और तुरंत वहां से भागने का मन करता है. छिपकली को लेकर इस तरह का डर कई लोगों में देखा जाता है. खासकर जब घर में अचानक छिपकली सामने आ जाए, तो कई लड़कियां भी घबराकर चीखने या वहां से दूर जाने लगती हैं. लेकिन आखिर ऐसा क्यों होता है, जबकि आम घरों में दिखाई देने वाली छिपकलियां ज्यादातर लोगों के लिए कोई बड़ा खतरा नहीं होतीं?

मनोविज्ञान के मुताबिक, किसी चीज से डर लगना सिर्फ उस चीज के खतरनाक होने पर निर्भर नहीं करता. हमारा दिमाग किसी चीज को खतरे के रूप में कैसे देखता है, यह भी काफी मायने रखता है. छिपकली को लेकर डर भी इसी तरह की प्रतिक्रिया हो सकता है.

छिपकली देखते ही शरीर क्यों देने लगता है डर का रिएक्शन?

डर शरीर की सबसे तेज प्रतिक्रियाओं में से एक है. जब इंसान किसी ऐसी चीज को देखता है जिसे उसका दिमाग संभावित खतरे के तौर पर समझता है, तो एमिग्डाला तुरंत सक्रिय हो सकता है. यह दिमाग का वह हिस्सा है जो भावनाओं को प्रोसेस करने में अहम भूमिका निभाता है. इसके बाद शरीर में फाइट या फ्लाइट यानी खतरे से लड़ने या वहां से निकलने की प्रतिक्रिया शुरू हो सकती है.

छिपकली से बहुत ज्यादा डरने वाले व्यक्ति में भी यही प्रक्रिया हो सकती है. शरीर में एड्रेनालिन जैसे स्ट्रेस हार्मोन रिलीज होने लगते हैं, जिससे दिल की धड़कन और सांस लेने की रफ्तार बढ़ सकती है और पसीना आने लगता है. यही वजह है कि किसी व्यक्ति को छिपकली देखकर अचानक घबराहट महसूस हो सकती है, भले ही उसे यह पता हो कि सामने मौजूद छिपकली वास्तव में उसके लिए बड़ा खतरा नहीं है.

चार्ल्स यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ जूलॉजी, फैकल्टी ऑफ साइंस के शोधकर्ताओं ने ‘ह्यूमन एटिट्यूड टुवर्ड रेप्टाइल्स: ए रिलेशनशिप बिटवीन फियर, डिस्गस्ट एंड एस्थेटिक प्रेफरेंसेज’ नाम की स्टडी में इंसानों के सरीसृपों के प्रति डर, घिन और पसंद से जुड़े व्यवहार का अध्ययन किया है. इससे यह समझने में मदद मिलती है कि किसी सरीसृप को देखकर इंसान की प्रतिक्रिया सिर्फ वास्तविक खतरे पर आधारित नहीं होती, बल्कि डर और घिन जैसी भावनाएं भी इसमें भूमिका निभा सकती हैं. यानी दिमाग हमेशा वास्तविक खतरे और महसूस किए गए खतरे के बीच तुरंत अंतर नहीं कर पाता. एक बार किसी चीज को लेकर डर की प्रतिक्रिया बन जाए तो शरीर कई बार सोचने-समझने से पहले ही प्रतिक्रिया देना शुरू कर देता है.

छिपकली से डर पैदा होने की वजह क्या है?

छिपकली का डर हर व्यक्ति में एक जैसी वजह से पैदा नहीं होता. कुछ लोगों में यह डर बचपन के किसी अनुभव से जुड़ा हो सकता है. वहीं कई लोग अपने परिवार या आसपास के लोगों के व्यवहार से भी डर सीख सकते हैं. अगर कोई बच्चा अपने माता-पिता या परिवार के किसी सदस्य को छिपकली देखते ही घबराते या उससे दूर भागते हुए देखता है, तो उसके मन में भी उस जीव को लेकर डर बन सकता है.

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मनोविज्ञान में किसी खास चीज या स्थिति को लेकर जरूरत से ज्यादा और लगातार डर को स्पेसिफिक फोबिया कहा जाता है. अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन यानी एपीए के मुताबिक, फोबिया में डर वास्तविक खतरे की तुलना में बहुत ज्यादा हो सकता है, लेकिन जिस व्यक्ति को यह डर महसूस होता है, उसके लिए वह पूरी तरह वास्तविक होता है. छिपकली का फोबिया सांप या मकड़ी के फोबिया की तुलना में कम आम बताया जाता है, लेकिन इसके बनने की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया काफी हद तक समान हो सकती है.

अचानक दौड़ती छिपकली देखकर क्यों बढ़ जाता है डर?

छिपकली का अचानक सामने आ जाना भी डर को बढ़ा सकता है. रिसर्च में यह बात सामने आई है कि इंसान अचानक और अनपेक्षित तरीके से हिलने वाले जीवों को लेकर ज्यादा सतर्क हो सकता है. छिपकली का अचानक दीवार पर दौड़ना, उसकी दिशा का तेजी से बदलना और बिना किसी चेतावनी के दिखाई देना दिमाग में खतरे जैसी प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है.

इसका मतलब यह नहीं है कि छिपकली वास्तव में उतनी ही खतरनाक है जितना उस समय शरीर महसूस करता है. कई बार दिमाग का खतरे को पहचानने वाला सिस्टम वास्तविक खतरे से पहले ही प्रतिक्रिया शुरू कर देता है.

क्या छिपकली का डर खत्म किया जा सकता है?

अगर किसी व्यक्ति को छिपकली देखकर बहुत ज्यादा डर लगता है, तो इस डर को कम किया जा सकता है. ‘ए स्टडी ऑफ ट्रीटमेंट ऑफ लिजर्ड फोबिया यूजिंग विजिबल एंड इनविजिबल मार्कर-बेस्ड एआर एप्लीकेशन’ में भी छिपकली के फोबिया को कम करने के लिए उपचार के तरीकों पर अध्ययन किया गया है. बार-बार सुरक्षित अनुभव होने पर दिमाग धीरे-धीरे यह सीख सकता है कि जिस चीज को वह खतरा समझ रहा था, वह वास्तव में उतनी खतरनाक नहीं है. रिलैक्सेशन तकनीक, सांस से जुड़े एक्सरसाइज और जानवरों के व्यवहार के बारे में सही जानकारी भी घबराहट कम करने में मदद कर सकती है.

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एक्सपर्ट के मुताबिक फोबिया के इलाज में थेरेपी और धीरे-धीरे एक्सपोजर मददगार हो सकता है. इसमें व्यक्ति को तुरंत असली छिपकली के सामने नहीं लाया जाता. शुरुआत कम डरावनी चीज से की जाती है, जैसे छिपकली की तस्वीर देखना. इसके बाद वीडियो और फिर नियंत्रित तरीके से वास्तविक स्थिति तक पहुंचा जाता है. यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिल्स यानी यूसीएलए भी स्पेसिफिक फोबिया को ऐसी स्थिति के रूप में पहचानता है जो लगातार बनी रहे और व्यक्ति के लिए उसे नियंत्रित करना मुश्किल हो. अगर डर इतना बढ़ जाए कि रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, तो इसे सिर्फ कमजोरी समझने के बजाय सही मदद लेना जरूरी हो सकता है.

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