Gadhiya Ghat Mata Temple: भारत अपनी प्राचीन संस्कृति और रहस्यमयी मंदिरों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. यहां कई ऐसे स्थान हैं जहां विज्ञान के तर्क भी फीके पड़ जाते हैं. ऐसा ही एक अविश्वसनीय और विस्मयकारी मंदिर मध्य प्रदेश के आगर मालवा जिले में स्थित है, जिसे गड़ियाघाट माता मंदिर के नाम से जाना जाता है.
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां जलने वाला दीपक किसी घी या तेल से नहीं, बल्कि नदी के पानी से जलता है.
कालीसिंध नदी के तट पर स्थित पावन धाम
यह चमत्कारी मंदिर नलखेड़ा कस्बे से करीब 15 किलोमीटर दूर गाड़िया गांव के पास कालीसिंध नदी के किनारे स्थित है. नदी के सुरम्य तट पर स्थित होने के कारण यहां का वातावरण अत्यंत शांत और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर रहता है. सालों से यह मंदिर स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र रहा है, लेकिन पानी से दीपक जलने के रहस्य ने इसे देश भर में प्रसिद्ध कर दिया है.
रहस्यमयी दीपक की कहानी: जब मां ने दिया संकेत
स्थानीय मान्यताओं और मंदिर के पुजारी के अनुसार, दशकों पहले इस मंदिर में भी अन्य मंदिरों की तरह तेल और घी के दीपक ही जलाए जाते थे. लेकिन कहा जाता है कि एक रात माता ने मंदिर के पुजारी को स्वप्न में दर्शन दिए. माता ने पुजारी से कहा कि अब से उन्हें तेल की आवश्यकता नहीं है, बल्कि पास बहने वाली कालीसिंध नदी के जल से ही ज्योति प्रज्वलित की जाए.
अगली सुबह पुजारी जब नदी का पानी लेकर आए और उसे दीपक में डालकर माचिस की तीली जलाई, तो वह दीपक सामान्य ज्योत की तरह धधक उठा. शुरुआत में पुजारी स्वयं इस घटना से भयभीत थे और करीब दो महीनों तक उन्होंने यह बात किसी को नहीं बताई. लेकिन जब उन्होंने ग्रामीणों के सामने इसका प्रत्यक्ष प्रमाण दिया, तो सभी की आंखें फटी की फटी रह गईं.
परंपरा और विज्ञान का द्वंद्व
तब से आज तक यह परंपरा निरंतर जारी है. जैसे ही दीपक में कालीसिंध नदी का पानी डाला जाता है, वह एक चिपचिपे तरल (लिक्किड) में बदल जाता है और ज्योति जलने लगती है. इस चमत्कार को देखने के लिए हर साल हजारों श्रद्धालु और जिज्ञासु यहां आते हैं. कई लोगों ने इसके पीछे वैज्ञानिक कारण खोजने की कोशिश की, लेकिन भक्तों के लिए यह शुद्ध रूप से माता का आशीर्वाद है.
बरसात के मौसम में जब कालीसिंध नदी का जलस्तर बढ़ जाता है, तब यह मंदिर जलमग्न हो जाता है. उस दौरान यहां पूजा और दीपक बंद कर दिए जाते हैं. पुनः शारदीय नवरात्रि के पहले दिन (घटस्थापना) मंदिर के कपाट खुलते हैं और फिर से उसी पावन जल से अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है.
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