Somnath Amrit Mahotsav 2026: सोमनाथ मंदिर में कुंभाभिषेक, क्या है ये अनुष्ठा, यहां इतिहास में प

Somnath Amrit Mahotsav 2026: सोमनाथ मंदिर में कुंभाभिषेक, क्या है ये अनुष्ठा, यहां इतिहास में प


Somnath Amrit Mahotsav 2026 Kumbhabhishek: गुजरात सोमनाथ मंदिर में एक बार फिर इतिहास रचा है. भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माने जाने वाले इस पवित्र धाम में आज कुंभाभिषेक किया गया. इतिहास में पहली बार सोमनाथ मंदिर के शिखर पर 11 तीर्थों के जल से कुंभाभिषेक हुआ, इसमें पीएम मोदी भी शामिल हुए. क्या है कुंभाभिषेक, कैसे किया जाएगा, इसका महत्व भी जान लें.

क्या है कुंभाभिषेक ?

कुंभाभिषेक = ‘कुंभ’ (कलश) + ‘अभिषेक’ (स्नान) पवित्र कलश जल से मंदिर शिखर का अभिषेक, इसका दूसरा अर्थ है मंदिर को ‘पुनः जीवित’ करना. जब विशेष वैदिक अनुष्ठानों के बाद अभिमंत्रित जल को मंदिर के शिखर, कलश और देव विग्रहों पर चढ़ाया जाता है, तो उसे कुंभाभिषेक कहा जाता है.

पीएम ने सोमनाथ मंदिर में की पूजा

कुंभाभिषेक क्यों किया जाता है

ये कोई सामान्य पूजा नहीं होती, बल्कि कई दिनों तक चलने वाला वैदिक अनुष्ठान होता है. इसमें यज्ञ, हवन, रुद्र पाठ, मंत्रोच्चार और अग्नि अनुष्ठानों के जरिए जल को आध्यात्मिक ऊर्जा से अभिमंत्रित किया जाता है. बाद में उसी जल से मंदिर के शिखर और देव विग्रहों का अभिषेक किया जाता है.  सनातन मान्यताओं के अनुसार इससे मंदिर की सकारात्मक ऊर्जा कई गुना बढ़ती है और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव समाप्त होता है.आगम शास्त्रों के अनुसार अधिकांश मंदिरों में हर 12 साल में पुनः कुंभाभिषेक किया जाता है

कैसे होता है कुंभाभिषेक ?

  • इस दौरान 51 वैदिक ब्राह्मण अति रुद्र पाठ करेंगे, महा रुद्र यज्ञ में लगभग 1.25 लाख आहुतियां दी जाएंगी.
  • कुंभाभिषेक के लिए सबसे पहले मंदिर परिसर में विशेष यज्ञशाला बनाई जाती है, जहां पूरे अनुष्ठान का वैदिक आयोजन होता है. यही स्थान धार्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है
  • वेदपाठी ब्राह्मण कई दिनों तक रुद्र पाठ, हवन, अग्नि अनुष्ठान और वैदिक मंत्रोच्चार करते हैं इससे वातावरण को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध किया जाता है.
  • सैकड़ों कलशों में गंगाजल और विभिन्न तीर्थों एवं पवित्र नदियों का जल भरा जाता है. इन कलशों को विशेष मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाता है.
  • वैदिक विधियों के माध्यम से कलशों में भरे जल को आध्यात्मिक ऊर्जा से संपन्न किया जाता है. इसे दिव्य शक्ति का माध्यम माना जाता है.
  • मंदिर में स्थापित देव प्रतिमाओं और गर्भगृह की विशेष पूजा एवं शुद्धि की जाती है, ताकि सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो सके.
  • यदि नई मूर्तियां स्थापित की जाती हैं, तो उनमें ‘प्राण प्रतिष्ठा’ की जाती है. सनातन परंपरा में इसे देव शक्ति को मूर्ति में स्थापित करने की प्रक्रिया माना जाता है.
  • मूर्ति निर्माण का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण ‘नेत्र उन्मीलनम्’ होता है, जिसमें देव प्रतिमा की आंखों को पूर्ण रूप दिया जाता है. मान्यता है कि इसी क्षण से मूर्ति में चेतना जागृत होती है.
  • अंत में अभिमंत्रित पवित्र जल को मंदिर के शिखर, कलश और देव विग्रहों पर चढ़ाया जाता है. इसी प्रक्रिया को ‘कुंभाभिषेक’ कहा जाता है.
  • अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं और भक्त पहली बार नवऊर्जित देव विग्रहों के दर्शन करते हैं

कुंभाभिषेक का इतिहास

कुंभाभिषेक की परंपरा दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिरों में विशेष रूप से प्रसिद्ध रही है. तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के कई बड़े मंदिरों में समय-समय पर यह आयोजन होता है लेकिन सोमनाथ मंदिर के शिखर पर पहली बार इस तरह का कुंभाभिषेक होना ऐतिहासिक पल रहेगा.

धार्मिक विशेषज्ञों के अनुसार मंदिर केवल पत्थरों से बनी संरचना नहीं होते, बल्कि उनमें स्थापित देव विग्रहों और वैदिक मंत्रों के माध्यम से दिव्य ऊर्जा का संचार होता है. कुंभाभिषेक उसी ऊर्जा को पुनः सक्रिय करने की प्रक्रिया मानी जाती है.

सोमनाथ मंदिर में क्यों हो रहा कुंभाभिषेक

मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा और पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में सोमनाथ अमृत पर्व का भव्य आयोजन किया जा रहा है. इसी के चलते मंदिर के 90 मीटर ऊंचे शिखर पर कुंभाभिषेक हुआ जिसका साक्षी भारत. बना देशभर से श्रद्धालु इस ऐतिहासिक पल को देखने के लिए सोमनाथ पहुंचे.

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