यूरोप इस समय भारी राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है. फ्रांस और इटली जैसे प्रमुख यूरोपीय देशों में चल रहे विरोध प्रदर्शनों की आग ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि अब पूर्वी यूरोप का एक अहम देश पोलैंड भी भीषण सियासी और संवैधानिक संकट के मुहाने पर आ खड़ा हुआ है. राजधानी वार्सॉ में पोलैंड के संवैधानिक न्यायाधिकरण के बाहर जो कुछ घटा, उसने पूरे देश को सकते में डाल दिया है. देश की न्यायपालिका पर नियंत्रण पाने के लिए सरकार और विपक्ष के बीच छिड़ी जंग अब खुली सड़कों पर संग्राम का रूप ले चुकी है, जहां प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार पर ‘संवैधानिक तख्तापलट’ करने के गंभीर आरोप लग रहे हैं.
संकट की शुरुआत कहां के हुई
इस ताजा भूचाल की शुरुआत तब हुई जब शुक्रवार की देर शाम पोलैंड के संवैधानिक न्यायाधिकरण के अध्यक्ष बोगदान श्वेज़्कोव्स्की को उनके पद से हटाए जाने की खबर सामने आई. यह कार्रवाई अदालत की सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश अन्ना कोरविन-पयोट्रोव्स्का द्वारा की गई.
श्वेज़्कोव्स्की को पिछली दक्षिणपंथी ‘लॉ एंड जस्टिस’ (PiS) पार्टी की सरकार के कार्यकाल के दौरान नियुक्त किया गया था. वर्तमान प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क के समर्थक और वाम-मध्यमार्गी गठबंधन का तर्क है कि श्वेज़्कोव्स्की और उनके करीबी सहयोगी संसद द्वारा चुने गए नए न्यायाधीशों को उनके पदों पर कार्यभार संभालने से रोक रहे थे और अदालत का राजनीतिकरण कर रहे थे.
हालांकि, इस निलंबन के तुरंत बाद न्यायाधिकरण की आधिकारिक वेबसाइट अचानक बंद हो गई और कोर्ट के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से बयान जारी कर इसे “संवैधानिक तख्तापलट” करार दिया गया. अदालत के नेतृत्व ने साफ कहा कि श्वेज़्कोव्स्की और उपाध्यक्ष बार्टलोमीज सोचान्स्की ही कानूनी रूप से वैध न्यायाधिकरण के प्रमुख हैं, और अन्ना कोरविन का यह कदम पूरी तरह से गैर-कानूनी है.
राष्ट्रपति का यू-टर्न और सेनेगल दौरा बीच में रद्द
इस नाटकीय घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सबका ध्यान खींचा है. पोलैंड के राष्ट्रपति करोल नवराोकी जो उस समय एक आधिकारिक राजकीय यात्रा पर सेनेगल की उड़ान पर थे, देश के हालात की गंभीरता को भांपते हुए बीच रास्ते से ही अपनी फ्लाइट को वापस मोड़ने का आदेश दे दिया. वार्सॉ लौटते ही राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि संकट के इस दौर में देश के प्रमुख को अपनी भूमि पर होना अनिवार्य है.
राष्ट्रपति नवराोकी और विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने और तानाशाही की तरफ बढ़ने का सीधा आरोप लगाया है. ‘लॉ एंड जस्टिस’ (PiS) पार्टी के प्रमुख जारोसलाव काक्ज़िन्स्की ने कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा, “आज से पोलैंड एक पुलिस राज्य बनता जा रहा है, और यहां से तानाशाही की तरफ सीधा रास्ता जाता है.”
PM डोनाल्ड टस्क का बचाव और ‘कानून के राज’ की दुहाई
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने अपने बचाव में सोशल मीडिया पर एक बयान जारी किया. उन्होंने लिखा:
“कानून के शासन को बहाल करना हमारा कर्तव्य है. पीआईएस (PiS) के नेतृत्व वाले वर्षों के अधर्म के बाद, यह एक कठिन प्रक्रिया है, जो कभी-कभी दर्दनाक होती है, और इसके लिए कड़े कदमों की आवश्यकता होती है. इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है.”
साल 2023 में सत्ता में आने के बाद से ही डोनाल्ड टस्क का गठबंधन लगातार यह दावा करता रहा है कि पिछली सरकार ने न्यायपालिका में ऐसे बदलाव किए थे जिससे अदालतों की स्वतंत्रता खत्म हो गई और वे सत्ताधारी दल की कठपुतली बन गईं. यूरोपीय संघ (EU) और मानवाधिकार की कई यूरोपीय संस्थाओं ने भी अतीत में पोलैंड की न्यायपालिका की संरचना पर सवाल उठाए थे. लेकिन इन सुधारों को लागू करने के रास्ते में राष्ट्रपति के वीटो पावर और पूर्ववर्ती नियुक्त न्यायाधीशों की मजबूत पकड़ सबसे बड़ी बाधा बनी हुई थी.
सड़कों पर उतरा जनसैलाब और पुलिस बल का कड़ा पहरा
इस शीर्ष संस्थागत घमासान का असर तुरंत जमीन पर दिखा. फैसले और निलंबन की खबर फैलते ही सैकड़ों की संख्या में प्रदर्शनकारी, विपक्षी दलों के कार्यकर्ता और आम नागरिक वार्सॉ में संवैधानिक न्यायाधिकरण के बाहर जमा हो गए.
स्थिति को नियंत्रण से बाहर जाने से रोकने के लिए भारी संख्या में दंगा रोधी पुलिस और सुरक्षा बलों को तैनात किया गया. अदालत के मुख्य प्रवेश द्वार को पुलिस छावनी में बदल दिया गया.
बैरिकेड्स तोड़कर और सुरक्षा चक्र को भेदकर अदालत के परिसर में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे कुछ प्रदर्शनकारियों और पूर्व अधिकारियों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया.
पूर्व न्याय मंत्री और विपक्षी नेताओं ने पुलिस पहरे के बीच अदालत के बाहर सरकार विरोधी नारे लगाए. यहां तक कि निलंबित मुख्य न्यायाधीश श्वेज़्कोव्स्की खुद अदालत के बाहर पहुंचे और पुलिसकर्मियों से उन्हें अंदर जाने देने की गुहार लगाई, जिससे वहां तनाव और अधिक बढ़ गया.
राजदूतों के इस्तीफे
इस आंतरिक कलह का असर पोलैंड की विदेश नीति और कूटनीतिक मोर्चे पर भी दिखने लगा है. चीन में पोलैंड के राजदूत याकुब कुमोच और रोमानिया में पोलैंड के राजदूत पावेल सोलोच ने देश के भीतर घटित हो रहे असंवैधानिक घटनाक्रम और न्यायाधिकरण पर जबरन कब्जे के विरोध में अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है. दोनों राजनयिकों का साफ कहना था कि वे इस तरह के प्रशासनिक और कानूनी उल्लंघन के बीच अपनी सेवाएं जारी नहीं रख सकते.
किधर जा रहा है पोलैंड का लोकतंत्र?
यह पूरा विवाद इस बात का प्रतीक है कि कैसे वैचारिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई किसी भी देश की लोकतांत्रिक रीढ़ यानी न्यायपालिका को अंदर से खोखला कर सकती है. 2015 से चले आ रहे इस संवैधानिक संकट ने अब एक विस्फोटक रूप ले लिया है.
एक तरफ डोनाल्ड टस्क की सरकार इसे ‘भ्रष्टाचार और पिछली सत्ता के प्रभावों को समाप्त करने की अनिवार्य प्रक्रिया’ बता रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष और राष्ट्रपति इसे ‘संविधान की हत्या और सत्ता पर अवैध कब्जा’ करार दे रहे हैं. जैसे-जैसे देश में अगले बड़े राजनीतिक चुनावों का समय नजदीक आ रहा है, यह सड़क से लेकर संसद और अदालत तक का यह संघर्ष पोलैंड के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए एक बहुत बड़ी अग्निपरीक्षा बन चुका है.





