लंगड़ा बुखार का खतरा खासतौर पर 6 महीने से 2 साल तक के बछड़ों और बछड़ियों में ज्यादा रहता है. अच्छी मांसपेशियों वाले स्वस्थ पशु भी इसकी चपेट में आ सकते हैं. इसलिए इस उम्र के पशुओं की सेहत पर खास ध्यान दें.

लंगड़ा बुखार के जीवाणु मिट्टी में कई साल तक जिंदा रह सकते हैं. संक्रमित मिट्टी, गंदे चारे और दूषित पानी के संपर्क में आने से पशुओं में संक्रमण फैल सकता है. इसलिए पशुओं को साफ पानी और अच्छी क्वालिटी का चारा ही दें.

इस बीमारी की शुरुआत में पशु को तेज बुखार आता है. वह खाना-पीना और जुगाली करना कम या बंद कर देता है. उसकी सांस तेज चलने लगती है और आंखें लाल दिखाई दे सकती हैं.

लंगड़ा बुखार में कंधे, गर्दन और पिछले पैरों की मांसपेशियों में सूजन आ सकती है. सूजे हुए हिस्से को दबाने पर चट-चट जैसी आवाज सुनाई दे सकती है. पशु पहले लंगड़ाकर चलता है और बाद में चलने-फिरने में असमर्थ हो सकता है.

अगर लंगड़ा बुखार से पशु की मौत हो जाए, तो उसके शव को खुले में छोड़ना या इधर-उधर फेंकना खतरनाक हो सकता है. इससे संक्रमण दूसरे पशुओं तक फैलने का खतरा रहता है. शव का निस्तारण पशु चिकित्सक और स्थानीय प्रशासन की सलाह के अनुसार ही करवाएं.

लंगड़ा बुखार से बचाव के लिए पशुओं का समय पर टीकाकरण करवाना जरूरी है. उनके रहने की जगह साफ रखें और आसपास पानी जमा न होने दें. अगर पशु को अचानक बुखार, लंगड़ापन या मांसपेशियों में सूजन दिखे, तो घरेलू इलाज में समय गंवाने के बजाय तुरंत पशु चिकित्सक को दिखाएं.
Published at : 02 Nov 2026 04:26 PM (IST)
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