अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन में एक और बड़ा बदलाव हुआ है. अमेरिकी न्याय विभाग के नागरिक अधिकार प्रभाग की प्रमुख हरमीत कौर ढिल्लों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. 5 नवंबर 2026 को अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लैंच ने उनके इस्तीफे की पुष्टि की. वह करीब 19 महीने तक इस पद पर रहीं. खास बात यह है कि उनका इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी मिडटर्म चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका लगा है और डेमोक्रेटिक पार्टी ने कांग्रेस में नियंत्रण हासिल किया है.
हरमीत ढिल्लों को ट्रंप का करीबी और उनकी नीतियों का मुखर समर्थक माना जाता रहा है. नागरिक अधिकारों से जुड़े विभाग की कमान संभालने के बाद उन्होंने इसकी प्राथमिकताओं में बड़े बदलाव किए. उनके कार्यकाल में नस्लीय भेदभाव, विश्वविद्यालयों में दाखिले, DEI यानी विविधता, समानता और समावेशन की नीतियों और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर कई बड़े फैसले हुए. इन फैसलों की वजह से वह अमेरिका में राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गईं.
लेकिन सवाल है कि आखिर हरमीत ढिल्लों कौन हैं? भारत के चंडीगढ़ में जन्मीं एक लड़की अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण कानूनी विभागों में से एक की प्रमुख कैसे बनीं? और उनके कार्यकाल को लेकर इतने विवाद क्यों हुए?
इस्तीफे की वजह क्या है?
हरमीत ढिल्लों ने अपने इस्तीफे को निजी फैसला बताया है. उनका कहना है कि वह कुछ सप्ताह पहले ही यह तय कर चुकी थीं कि अब उन्हें सरकारी पद छोड़कर निजी वकालत में वापस जाना है. उन्होंने फॉक्स न्यूज को बताया कि उन्होंने व्हाइट हाउस की चीफ ऑफ स्टाफ सूसी वाइल्स को अपने फैसले की जानकारी दी थी. वाइल्स ने उनसे मिडटर्म चुनावों तक पद पर बने रहने का अनुरोध किया था.
ढिल्लों के मुताबिक, वह वाशिंगटन आकर जिस उद्देश्य से काम करना चाहती थीं, उसे पूरा कर चुकी हैं. वहीं, उनके इस्तीफे का राजनीतिक संदर्भ भी काफी अहम है. ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को मिडटर्म चुनावों में हार का सामना करना पड़ा है. ऐसे में डेमोक्रेटिक पार्टी को अब ट्रंप प्रशासन की नीतियों और सरकारी एजेंसियों की जांच करने का अवसर मिलेगा.
हरमीत ढिल्लों ट्रंप प्रशासन छोड़ने वाली मिडटर्म चुनावों के बाद पहली बड़ी अधिकारियों में से एक हैं. हालांकि उनके इस्तीफे को केवल चुनावी नतीजों से जोड़ना उचित नहीं होगा.
चंडीगढ़ में जन्म, अमेरिका में पढ़ाई
हरमीत कौर ढिल्लों का जन्म भारत के चंडीगढ़ में हुआ था. बचपन में उनका परिवार ब्रिटेन गया और बाद में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के ब्रॉन्क्स इलाके में बस गया. इसके बाद उनका परिवार नॉर्थ कैरोलिना के स्मिथफील्ड में रहने लगा.
कम उम्र से ही पढ़ाई में उनकी रुचि थी. उन्होंने महज 16 साल की उम्र में हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली थी. इसके बाद उन्होंने अमेरिका के प्रतिष्ठित डार्टमाउथ कॉलेज में दाखिला लिया. यहां उन्होंने क्लासिकल स्टडीज की पढ़ाई की और कॉलेज के अखबार ‘द डार्टमाउथ रिव्यू’ की एडिटर-इन-चीफ भी बनीं.
इसके बाद उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया स्कूल ऑफ लॉ से कानून की पढ़ाई की. यहां वह प्रतिष्ठित कानूनी पत्रिका ‘वर्जीनिया लॉ रिव्यू’ के संपादकीय बोर्ड का हिस्सा रहीं. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अमेरिकी फेडरल कोर्ट ऑफ अपील्स के जज पॉल वी. नीमेयर के साथ क्लर्क के तौर पर भी काम किया.
उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि और कानूनी अनुभव ने आगे चलकर उन्हें अमेरिकी राजनीति और न्याय व्यवस्था में पहचान दिलाई.
वकालत से रिपब्लिकन राजनीति तक का सफर
हरमीत ढिल्लों ने 2006 में अपनी लॉ फर्म ‘ढिल्लों लॉ ग्रुप’ की स्थापना की. उनका काम मुख्य रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों, चुनावी कानून और संवैधानिक मामलों से जुड़ा रहा.
उन्होंने सेंटर फॉर अमेरिकन लिबर्टी नामक संगठन की भी स्थापना की. यह संगठन नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में कानूनी लड़ाई लड़ता है.
हरमीत की पहचान एक रूढ़िवादी विचारधारा वाली वकील के तौर पर बनी. उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले की फ्री स्पीच नीतियों को अदालत में चुनौती दी. कोविड-19 महामारी के दौरान कई राज्यों के प्रतिबंधों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी और तकनीकी कंपनियों के खिलाफ भी मामले उठाए.
इसके अलावा वह कैलिफोर्निया की रिपब्लिकन राजनीति में सक्रिय रहीं. उन्होंने रिपब्लिकन नेशनल कमेटी में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई.
2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के बाद वह डोनाल्ड ट्रंप के कानूनी प्रयासों का हिस्सा बनीं. ट्रंप की चुनावी हार को चुनौती देने वाले मामलों में उन्होंने उनका साथ दिया. इसी वजह से वह ट्रंप के भरोसेमंद कानूनी सहयोगियों में शामिल हो गईं.
नागरिक अधिकार विभाग की कमान और विवाद
दिसंबर 2024 में डोनाल्ड ट्रंप ने हरमीत ढिल्लों को अमेरिकी न्याय विभाग के नागरिक अधिकार प्रभाग का प्रमुख बनाने के लिए नामित किया. अमेरिकी सीनेट से मंजूरी मिलने के बाद 7 अप्रैल 2025 को उन्होंने पद संभाला.
यह विभाग अमेरिका में नस्लीय भेदभाव, मतदान के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, शिक्षा, रोजगार और पुलिस व्यवस्था में नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए काम करता है.
लेकिन ढिल्लों के नेतृत्व में विभाग की प्राथमिकताएं बदलने लगीं. उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में DEI नीतियों को खत्म करना शामिल था. ट्रंप प्रशासन का मानना था कि ऐसी नीतियां योग्यता के बजाय नस्ल और पहचान को महत्व देती हैं. इसके उलट आलोचकों का कहना था कि DEI नीतियां ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को समान अवसर देने के लिए जरूरी हैं.
ढिल्लों के नेतृत्व में विश्वविद्यालयों के खिलाफ जांच शुरू हुई. इनमें अल्पसंख्यक छात्रों को दाखिले में अनुचित लाभ देने और यहूदी छात्रों के खिलाफ भेदभाव या यहूदी विरोधी गतिविधियों के आरोप शामिल थे.
उनके समर्थकों ने इसे शिक्षा संस्थानों में समानता और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा बताया, जबकि विरोधियों ने इसे विश्वविद्यालयों पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कहा.
पुलिस सुधार और कर्मचारियों के पलायन का विवाद
हरमीत ढिल्लों के कार्यकाल का एक बड़ा विवाद पुलिस सुधार से जुड़ा रहा. उनके नेतृत्व में न्याय विभाग ने कई पुलिस विभागों के खिलाफ पहले से चल रही जांच और सुधार समझौतों को वापस लिया या उनकी प्राथमिकता कम कर दी.
आलोचकों का कहना था कि इससे पुलिस हिंसा और नस्लीय भेदभाव के खिलाफ चल रही कोशिशों को नुकसान पहुंचा. वहीं प्रशासन के समर्थकों का तर्क था कि पिछली सरकार के दौरान पुलिस विभागों पर जरूरत से ज्यादा संघीय नियंत्रण स्थापित किया गया था.
उनके कार्यकाल में नागरिक अधिकार प्रभाग के कर्मचारियों की संख्या में भी भारी गिरावट आई. कई रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल में विभाग के शुरुआती कर्मचारियों में से तीन-चौथाई से अधिक लोग विभाग छोड़ चुके थे.
पूर्व अधिकारियों ने इसे विभाग के संस्थागत अनुभव और विशेषज्ञता का नुकसान बताया. वहीं ढिल्लों ने अपने कार्यकाल में नए वकीलों की भर्ती और विभाग के पुनर्गठन को अपनी उपलब्धियों में गिनाया.
सोशल मीडिया पर बयान और आलोचना
हरमीत ढिल्लों अपने सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर भी विवादों में रहीं. न्याय विभाग की परंपरा रही है कि चल रही जांच के बारे में सार्वजनिक रूप से बहुत सीमित जानकारी दी जाए. लेकिन ढिल्लों कई बार सोशल मीडिया पर जांच से जुड़ी जानकारियां साझा करती थीं.
इसके अलावा दिव्यांग लोगों के लिए अपमानजनक शब्द के सार्वजनिक इस्तेमाल और कुछ राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा को लेकर भी उनकी आलोचना हुई.
नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले विभाग की प्रमुख से इस तरह की भाषा की उम्मीद नहीं की जाती. आलोचकों ने इसे उनके पद की जिम्मेदारी और सार्वजनिक आचरण के लिहाज से अनुचित बताया.
हरमीत ढिल्लों की विरासत क्या होगी?
हरमीत ढिल्लों का कार्यकाल अमेरिकी नागरिक अधिकारों की राजनीति में एक बड़े बदलाव के तौर पर देखा जाएगा. उनके समर्थकों के लिए वह ऐसी वकील हैं जिन्होंने सरकारी संस्थाओं में रूढ़िवादी विचारों और संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता दी. उनके विरोधियों के मुताबिक, उन्होंने नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले एक महत्वपूर्ण विभाग की मूल भूमिका को कमजोर किया और उसे राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बना दिया.
उनके इस्तीफे के बाद यह बहस और तेज हो सकती है कि अमेरिका में नागरिक अधिकारों की परिभाषा क्या होनी चाहिए और सरकार की जिम्मेदारी किन समुदायों के प्रति कितनी होनी चाहिए.
चंडीगढ़ से अमेरिका तक पहुंचने वाली हरमीत ढिल्लों की कहानी केवल एक भारतीय मूल की महिला के अमेरिकी प्रशासन में शीर्ष पद तक पहुंचने की कहानी नहीं है. यह अमेरिकी राजनीति में विचारधारा, सत्ता, नागरिक अधिकारों और न्याय व्यवस्था के बीच चल रहे संघर्ष की भी कहानी है.





