पाकिस्तान को पूरी तरह बायपास करेगा भारत का नया गैस रूट! जानें क्या है 7 अरब डॉलर वाला प्रोजेक्ट

पाकिस्तान को पूरी तरह बायपास करेगा भारत का नया गैस रूट! जानें क्या है 7 अरब डॉलर वाला प्रोजेक्ट


बढ़ती ग्लोबल तेल कीमतों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से ईंधन बचाने की अपील की है. उन्होंने वर्क फ्रॉम होम अपनाने, वर्चुअल मीटिंग्स करने और पेट्रोल-डीजल का संयम से इस्तेमाल करने की सलाह दी है. हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि ये कदम केवल अल्पकालिक राहत दे सकते हैं. मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के कारण दुनिया अभूतपूर्व ईंधन संकट का सामना कर रही है. अमेरिका और इजरायल के ईरान के खिलाफ अभियान तथा होर्मुज स्ट्रेट पर दोहरे दबाव के चलते पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की आपूर्ति प्रभावित हुई है. भारत ने अब तक कीमतों के झटकों को काफी हद तक संभाल लिया है, लेकिन स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है.

भारत की इंपोर्टेड तेल पर निर्भरता लंबे समय से चुनौती रही है. इसी वजह से देश दशकों से बड़े ऊर्जा पाइपलाइन प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है. ओमान-भारत डीपवॉटर पाइपलाइन, भारत-श्रीलंका ऑयल पाइपलाइन और TAPI गैस पाइपलाइन जैसी योजनाएं 1990 और 2000 के दशक में सामने आई थीं, लेकिन जियोपॉलिटिकल तनाव, भारी लागत और सुरक्षा चुनौतियों के कारण अब तक पूरी तरह आगे नहीं बढ़ सकीं. भारत और ओमान के बीच प्रस्तावित डीप-वॉटर गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट एक बार फिर चर्चा में है. करीब चार दशक पुराने इस प्रोजेक्ट को अब भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है. अगर यह योजना जमीन पर उतरती है, तो अरब सागर की गहराई से सीधे भारत तक गैस पहुंचेगी और देश की विदेशी ऊर्जा निर्भरता का पूरा समीकरण बदल सकता है.

रक्षा विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार संदीप उन्नीथन ने सोमवार को X पर लिखा कि 1,600 किलोमीटर लंबी ओमान-भारत डीपवॉटर पाइपलाइन परियोजना (OIDMPP) पर 1990 के दशक से बातचीत चल रही है. यह पाइपलाइन रास अल जिफान से पोरबंदर तक समुद्र तल से 3,500 मीटर नीचे बिछाई जानी है. उन्होंने कहा, “अब इस परियोजना को तेजी से आगे बढ़ाने का समय आ गया है।” यह वही परियोजना है जिसे कभी तकनीकी रूप से असंभव माना गया था. लेकिन अब नई तकनीक, बदलती ग्लोबल पॉलिटिक्स और भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों ने इसे फिर से जिंदा कर दिया है.

क्या है Oman-India Deepwater Pipeline Project?
इस परियोजना का आधिकारिक नाम Middle East to India Deepwater Pipeline यानी MEIDP है. योजना यह है कि ओमान या यूएई से समुद्र के भीतर पाइपलाइन बिछाकर सीधे गुजरात तक प्राकृतिक गैस लाई जाए. प्रस्तावित पाइपलाइन अरब सागर के नीचे से होकर गुजरेगी और इसकी लंबाई करीब 1200 से 1600 किलोमीटर तक हो सकती है. यह पाइपलाइन समुद्र में लगभग 3400 से 3450 मीटर नीचे बिछाई जाने का अनुमान है. इतनी गहराई पर दुनिया में बहुत कम पाइपलाइन प्रोजेक्ट हुए हैं. यही वजह है कि इसे दुनिया की सबसे गहरी ट्रांसनेशनल अंडरसी गैस पाइपलाइन परियोजनाओं में गिना जा रहा है.

भारत के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट?
भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और आने वाले वर्षों में उसकी ऊर्जा जरूरतें और बढ़ने वाली हैं. सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक देश के ऊर्जा मिश्रण में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत तक पहुंचाई जाए. लेकिन फिलहाल भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा LNG यानी Liquefied Natural Gas इंपोर्ट करके पूरा करता है. LNG को जहाजों से लाया जाता है और फिर उसे दोबारा गैस में बदलने की प्रक्रिया होती है. इससे लागत बढ़ जाती है. MEIDP को इसी समस्या का समाधान माना जा रहा है. पाइपलाइन के जरिए गैस सीधे भारत पहुंचेगी, जिससे कीमत कम होगी और सप्लाई ज्यादा स्थिर रहेगी. दावा है कि इस पाइपलाइन से आने वाली गैस मौजूदा LNG की तुलना में 2 से 2.5 डॉलर प्रति MMBtu तक सस्ती होगी. अनुमान है कि इससे भारत को हर साल करीब 7000 करोड़ रुपये तक की बचत हो सकती है.

पाकिस्तान-अफगानिस्तान को पूरी तरह बायपास करेगा
इस प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा रणनीतिक फायदा इसकी रूटिंग है. पहले भारत के लिए TAPI (Turkmenistan-Afghanistan-Pakistan-India) और Iran-Pakistan-India जैसी पाइपलाइन परियोजनाएं प्रस्तावित थीं. लेकिन इन प्रोजेक्ट्स की सबसे बड़ी समस्या सुरक्षा और जियोपॉलिटिकल तनाव थे. अफगानिस्तान में अस्थिरता और पाकिस्तान के साथ तनाव की वजह से जमीन आधारित पाइपलाइन परियोजनाएं लगातार अटकती रहीं. MEIDP समुद्र के रास्ते आएगी. यानी किसी तीसरे देश पर निर्भरता नहीं होगी. पाइपलाइन सीधे मिडिल ईस्ट से भारत पहुंचेगी और सप्लाई बाधित होने का खतरा काफी कम हो जाएगा. यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे भारत की “जियोपॉलिटिकल एनर्जी शील्ड” भी कह रहे हैं.

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कैसे शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट?
इस परियोजना की कहानी नई नहीं है. इसकी शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी. पहली बार 1985 में ओमान से भारत तक गैस पाइपलाइन लाने का विचार सामने आया. इसके बाद 1993 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की ओमान यात्रा के दौरान इस परियोजना को कूटनीतिक समर्थन मिला. उस समय भारत तेजी से आर्थिक उदारीकरण की तरफ बढ़ रहा था और ऊर्जा सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन रही थी. हालांकि शुरुआती उत्साह के बाद यह परियोजना धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चली गई.

आखिर क्यों रुक गया था सपना?
बड़ी वजह थी तकनीक की कमी. उस दौर में ऐसी तकनीक उपलब्ध नहीं थी जो 3500 मीटर गहराई में पाइपलाइन बिछा सके. समुद्र के नीचे इतना दबाव होता है कि सामान्य स्टील पाइप टूट सकते हैं. उस समय न तो पर्याप्त मजबूत पाइप थे और न ही ऐसे जहाज मौजूद थे जो इतनी गहराई में पाइपलाइन बिछाने या उसकी मरम्मत का काम कर सकें. यानी आइडिया तो था, लेकिन तकनीक साथ नहीं दे रही थी. 

एलएनजी टैंकरों को होर्मुज स्ट्रेट जैसे संवेदनशील समुद्री रास्तों से गुजरना पड़ता है, जबकि समुद्र के भीतर बिछाई जाने वाली पाइपलाइन अधिक स्थिर और भरोसेमंद गैस आपूर्ति दे सकती है. इस परियोजना की तकनीकी व्यवहार्यता रिपोर्ट वर्षों पहले पूरी हो चुकी है, लेकिन निर्माण अब तक शुरू नहीं हो पाया. इसके शुरू होने से भारत को गैस आयात में विविधता और वैश्विक कीमतों के झटकों से राहत मिल सकती है.

2010 के बाद हालात बदलने लगे. डीप-सी इंजीनियरिंग में तेजी से प्रगति हुई. आधुनिक पाइप लेइंग वेसल्स और हाई-प्रेशर स्टील पाइप उपलब्ध होने लगे. इसी दौरान इस परियोजना को दोबारा आगे बढ़ाया. 2013 में बड़े पैमाने पर समुद्री सर्वे कराया गया. करीब 1780 किलोमीटर समुद्री रूट की जांच की गई ताकि सुरक्षित रास्ता तय किया जा सके. सर्वे में कई चुनौतीपूर्ण क्षेत्र सामने आए. इनमें Owen Fracture Zone सबसे खतरनाक माना गया, जहां भारतीय और अरबियन टेक्टोनिक प्लेट्स मिलती हैं. यह इलाका भूकंपीय रूप से सक्रिय है. इसके अलावा Indus Fan जैसे विशाल समुद्री तलछट क्षेत्र और गहरे समुद्री कैन्यन भी इंजीनियरों के लिए बड़ी चुनौती बने. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक तकनीक की मदद से अब इन चुनौतियों का समाधान संभव है.

अभी क्या है प्रोजेक्ट का स्टेटस?
2023 और 2024 में इस परियोजना को लेकर महत्वपूर्ण प्रगति हुई है. Preliminary Engineering and Cost Estimate Study पूरी की जा चुकी है और इसे तकनीकी रूप से व्यवहार्य माना गया है. फिलहाल परियोजना की अनुमानित लागत 6 से 7 अरब डॉलर के बीच बताई जा रही है. कुछ रिपोर्ट्स में ड्यूल पाइपलाइन सिस्टम पर भी विचार की बात कही गई है ताकि सप्लाई और ज्यादा भरोसेमंद बनाई जा सके. इसके साथ ही अब यूएई-इंडिया पाइपलाइन विकल्प पर भी चर्चा हो रही है. ADNOC की रुचि के बाद फुजैराह से गुजरात तक पाइपलाइन के विकल्प को भी देखा जा रहा है. भारत और ओमान के बीच हालिया आर्थिक सहयोग समझौतों ने भी इस परियोजना को नई गति दी है.

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