यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE) ने मंगलवार (28 अप्रैल) को कच्चे तेल का उत्पादन और निर्यात करने वाले देशों के ऑर्गेनाइजेशन OPEC और OPEC+ से अलग होने का ऐलान कर दिया है. यह फैसला ऐसे समय में आया है जब ईरान के साथ जारी युद्ध की वजह से दुनिया भर में एनर्जी यानी ऊर्जा संकट गहराया हुआ है. लंबे समय से OPEC का हिस्सा रहे UAE के इस कदम से सऊदी अरब की लीडरशिप वाले इस ग्रुप की एकता पर बड़ा असर पड़ सकता है. अब सवाल है कि इससे OPEC पर क्या असर पड़ेगा, क्या वह बिखर जाएगा और भारत को कैसे फायदा मिलेगा? जानेंगे एक्सप्लेनर में…
सवाल 1: OPEC क्या है और इसका काम क्या है?
जवाब: OPEC का पूरा नाम ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज है. यह 14 सितंबर 1960 को बगदाद में स्थापित किया गया था. इसके शुरुआती पांच संस्थापक सदस्य थे, ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला. UAE ने 1967 में OPEC जॉइन किया था.
OPEC का मुख्य उद्देश्य अपने सदस्य देशों की पेट्रोलियम नीतियों को समन्वयित और एकीकृत करना है ताकि तेल उत्पादकों को बेहतर और स्थिर कीमतें मिलें, उपभोक्ता देशों को कुशल और नियमित तेल आपूर्ति हो और उद्योग में निवेश करने वालों को उचित रिटर्न मिले.
वर्तमान में OPEC के 12 सदस्य देश हैं, जिनमें 5 संस्थापक देश और UAE के अलावा अल्जीरिया, कांगो, नाइजीरिया, लीबिया, गैबॉन और भूमध्यरेखीय गिनी शामिल हैं. यह संगठन दुनिया के कुल तेल उत्पादन का करीब 30% कंट्रोल करता है. 2016 से OPEC+ बना, जिसमें रूस, कजाकिस्तान आदि गैर-OPEC देश भी शामिल हो गए, जिससे कुल उत्पादन दुनिया के लगभग 40-41% तक पहुंच गया. OPEC को अक्सर कार्टेल कहा जाता है क्योंकि यह तेल की कीमतें कंट्रोल करने के लिए उत्पादन कोटा तय करता है. जब कीमतें गिरती हैं तो उत्पादन कम करता है और जब जरूरत पड़ती है तो बढ़ाता है.
सवाल 2: UAE ने OPEC क्यों छोड़ा?
जवाब: 28 अप्रैल 2026 को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने औपचारिक घोषणा की कि वह OPEC और OPEC+ दोनों को 1 मई 2026 से छोड़ रहा है. UAE ने कहा कि यह फैसला उसके ‘राष्ट्रीय हितों’ और ‘लंबी अवधि की रणनीतिक और आर्थिक विजन को ध्यान में रखकर लिया गया है. UAE अब अपनी घरेलू ऊर्जा उत्पादन क्षमता बढ़ाने और ग्लोबल एनर्जी मार्केट में ज्यादा स्वतंत्र भूमिका निभाने पर फोकस करना चाहता है.
यह फैसला ईरान युद्ध के बीच आया है, जिसमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (दुनिया के करीब 20% तेल और LNG गुजरने वाला रास्ता) प्रभावित है. UAE के राष्ट्रपति के डिप्लोमैटिक एडवाइजर अनवर मोहम्मद गर्गश ने कहा कि ईरान के हमलों के दौरान अरब और खाड़ी देशों (GCC) का रुख काफी कमजोर रहा. उन्होंने लॉजिस्टिक मदद की बात जरूर की, लेकिन राजनीतिक और सैन्य स्तर पर समर्थन की कमी पर निराशा जताई. यह कदम सऊदी अरब की अगुवाई वाले OPEC के लिए बड़ा झटका है. UAE OPEC का एक महत्वपूर्ण और अनुशासित सदस्य था.

सवाल 3: क्या OPEC बिखर रहा है, अगर हां तो यह कितना बड़ा बिखराव है?
जवाब: UAE का जाना OPEC के लिए बड़ा झटका जरूर है, लेकिन अभी पूरा बिखराव नहीं कहा जा सकता. UAE OPEC का तीसरा या चौथा सबसे बड़ा उत्पादक था. इसके जाने से OPEC की उत्पादन क्षमता में करीब 15% की कमी आ सकती है.
पिछले सालों में भी कई सदस्य आए-गए हैं, जैसे इंडोनेशिया, कतर, इक्वाडोर, अंगोला आदि ने सदस्यता छोड़ी या निलंबित की. लेकिन UAE जैसे मजबूत और अनुपालन करने वाले सदस्य का जाना अलग मायने रखता है.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह OPEC की एकता को कमजोर करता है और सऊदी अरब की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाता है. अगर और UAE जैसे अन्य खाड़ी देश भी इसी रास्ते पर चले तो भविष्य में OPEC का प्रभाव और घट सकता है. अभी यह एक सदस्य का जाना है, लेकिन ईरान युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के बीच यह संगठन के लिए चिंताजनक संकेत है.
सवाल 4: इस बिखराव से किसका नुकसान होगा?
जवाब: इस बिखराव से 4 बड़े नुकसान होंगे:
- OPEC और खासकर सऊदी अरब का नुकसान: उत्पादन कोटा तय करने और कीमतें कंट्रोल करने की ताकत कम होगी. सऊदी अरब को अकेले ज्यादा बोझ उठाना पड़ सकता है, जो OPEC का डी-फैक्टो लीडर है.
- तेल निर्यातक देशों का: अगर OPEC कमजोर हुआ तो तेल की कीमतें ज्यादा उतार-चढ़ाव वाली हो सकती हैं, जिससे उनकी आय प्रभावित होगी.
- दुनिया भर के तेल उपभोक्ताओंका फायदा-नुकसान: UAE अब कोटा से मुक्त होकर ज्यादा तेल उत्पादन कर सकता है, जिससे आपूर्ति बढ़ने और कीमतें गिरने की संभावना है. ईरान युद्ध के कारण फिलहाल ब्रेंट क्रूड 111 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर है. UAE के बाहर निकलने से लंबे समय में कीमतें स्थिर या नीचे आ सकती हैं. भारत जैसे बड़े आयातक देशों (जो 80% से ज्यादा तेल आयात करते हैं) को राहत मिल सकती है.
- ट्रंप प्रशासन के लिए: कई रिपोर्ट्स इसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीतिक जीत बता रही हैं. ट्रंप लंबे समय से OPEC पर आरोप लगाते रहे हैं कि यह तेल की कीमतें जानबूझकर बढ़ाकर दुनिया को लूट रहा है. UAE का जाना OPEC को कमजोर करता है और अमेरिका की ऊर्जा बाजार में प्रभाव बढ़ा सकता है.
सवाल 5: तो फिर इस मामले में आगे क्या हो सकता है?
जवाब: UAE का जाना तत्काल तेल आपूर्ति पर असर नहीं डालेगा क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अभी भी प्रभावित है, लेकिन लंबे समय में यह OPEC+ की एकता को चुनौती देगा. अगर कीमतें गिरती हैं तो सऊदी अरब और अन्य सदस्यों को बजट घाटा बढ़ सकता है.
एक्सपर्ट्स कह रहे हैं कि यह कदम UAE की अपनी ऊर्जा विविधीकरण और स्वतंत्र नीति की ओर बढ़ने का संकेत है. दुनिया के तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है. एक तरफ ईरान युद्ध है, तो दूसरी तरफ OPEC जैसे संगठनों का कमजोर होना.





