रबी सीजन की शुरुआत होते ही देश भर के किसान भाई उन फसलों की तरफ रुख करते हैं, जो कम समय और कम लागत में अधिकतम मुनाफा दे सकें. इस कड़ी में कृषि वैज्ञानिकों द्वारा मटर की खेती को एक बेहतरीन और टिकाऊ विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. विशेषज्ञों के मुताबिक, मटर एक ऐसी प्रमुख नकदी फसल है जो न केवल किसानों को बंपर आर्थिक लाभ पहुंचाती है, बल्कि खेत की मिट्टी की गिरती सेहत को सुधारने में भी काफी मददगार साबित हो रही है. यही वजह है कि देश के किसान अब इसे डबल मुनाफे का सौदा मानकर बड़े पैमाने पर अपना रहे हैं.
मिट्टी की सेहत के लिए वरदान है मटर की फसल
मटर एक प्रमुख दलहनी फसल है. दलहनी फसलों की सबसे बड़ी जैविक खासियत यह होती है कि इनकी जड़ों में राइजोबियम नाम के विशेष जीवाणु पाए जाते हैं. ये जीवाणु वायुमंडल में मौजूद नाइट्रोजन को सोखकर उसे प्राकृतिक रूप से मिट्टी में स्थिर कर देते हैं. इससे खेत की प्राकृतिक उपजाऊ क्षमता में भारी इजाफा होता है.
इसका सीधा तकनीकी फायदा यह होता है कि मटर की कटाई के बाद किसान जब अगली मुख्य फसल जैसे गेहूं या मक्का की बुवाई करते हैं, तो उन्हें बाजार से मिलने वाली महंगी रासायनिक खादों, विशेषकर यूरिया, पर अपनी निर्भरता काफी कम करनी पड़ती है. परिणामस्वरूप, अगली फसल की इनपुट कॉस्ट में बड़ी गिरावट आती है.
कम समय में बंपर कमाई
घरेलू बाजारों और मंडियों में सब्जी वाली हरी मटर की मांग हमेशा बहुत ऊंची रहती है. मटर की खेती का सबसे बड़ा USP इसका बेहद कम समय में तैयार होना है. कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा विकसित की गई मटर की कई अगेती उन्नत किस्में मात्र 60 से 75 दिनों के भीतर तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती हैं.
सीजन के शुरुआती दिनों में बाजार में हरी मटर का थोक व खुदरा भाव 60 से 80 रुपये प्रति किलो तक आसानी से मिल जाता है. कृषि विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि उन्नत वैज्ञानिक पद्धतियों से खेती की जाए, तो प्रति हेक्टेयर लागत निकालने के बाद किसान भाई 1.5 से 2 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा सकते हैं.
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उन्नत खेती के लिए ध्यान रखने योग्य तकनीकी बातें
मटर से रिकॉर्ड तोड़ पैदावार हासिल करने के लिए सही मिट्टी और अनुकूल जलवायु का चयन अनिवार्य है. इसके लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी को सर्वोत्तम माना गया है, जिसका pH मान 6 से 7.5 के बीच होना चाहिए. खेत की तैयारी के समय जलभराव की निकासी का उचित प्रबंध करना जरूरी है, क्योंकि मटर के पौधों की जड़ों में पानी जमा रहने से फसल में उकठा रोग का खतरा बढ़ जाता है.
इसके साथ ही, बुवाई से पहले बीजों का फंगिसाइड से उपचार करना बेहद जरूरी है. बुवाई के दौरान कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधों के बीच की दूरी 8 से 10 सेंटीमीटर बनाए रखनी चाहिए, ताकि पौधों को हवा और सूर्य का प्रकाश पर्याप्त मात्रा में मिल सके.
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